ABG Shipyard rishi agarawal

Biggest Bank Fraud: सीबीआई ने 22,842 करोड़ रुपये के सबसे बड़े बैंक धोखाधड़ी मामले में एबीजी शिपयार्ड के खिलाफ मामला दर्ज किया

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ABG Bank Fraud: सीबीआई ने बैंकिंग इतिहास के सबसे बड़े घोटाले की एफआईआर दर्ज की है. यह घोटाला 22842 करोड़ रुपये का बताया जा रहा है. सीबीआई की एफआईआर में घोटाले के लिए गुजरात की एबीजी शिपयार्ड कंपनी और उसकी सहयोगी कंपनियों को जिम्मेदार बताया गया है. सीबीआई ने विभिन्न आपराधिक धाराओं के तहत इसके निदेशकों ऋषि अग्रवाल, संथानम मुथुस्वामी और अश्विनी कुमार को भी मामले में आरोपी बनाया गया है।

यह सबसे बड़े बैंक धोखाधड़ी (नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से जुड़े पंजाब नेशनल बैंक घोटाले से भी बड़ा) मामलों में से एक है, जिसकी सीबीआई जांच करेगी। क्योंकि उसमें घोटाले की रकम 12 हजार करोड़ रुपये थी. इस मामले की जांच में जल्द ही दूसरी जांच एजेंसियां भी कूद सकती हैं .सीबीआई ने इस घोटाले में शनिवार को महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई राज्यों के 13 स्थानों पर छापेमारी की और कई अहम दस्तावेज बरामद किए. इस घोटाले की गूंज विधानसभा चुनाव और संसद सत्र में भी सुनाई दे सकती है. 

कैसे हुआ घोटाले का पर्दाफाश

सीबीआई के मुताबिक, इस मामले में बैंकों के समूह की तरफ से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया मुंबई शाखा में तैनात डिप्टी जनरल मैनेजर बालाजी सिंह सामंता ने सीबीआई को 25 अगस्त 2020 को एक लिखित शिकायत दी थी. सीबीआई की एफआईआर के मुताबिक, इस मामले में गुजरात के सूरत में पानी के जहाज, उससे जुड़ा सामान और जहाजों को रिपेयर करने वाली कंपनी एबीजी शिपयार्ड और एबीजी इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड समेत उसके प्रबंध निदेशक ऋषि कमलेश अग्रवाल का नाम शामिल है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की शिकायत पर दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट से पता चला है कि अप्रैल 2012 से जुलाई 2017 तक, आरोपियों ने एक-दूसरे के साथ मिलीभगत की और धन की हेराफेरी, हेराफेरी और आपराधिक उल्लंघन सहित अवैध गतिविधियों को अंजाम दिया। ट्रस्ट और उस उद्देश्य के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए जिसके लिए बैंक द्वारा धन जारी किया जाता है।

28 बैंकों के साथ फ्रॉड

सीबीआई की एफआईआर में आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और सरकारी संपत्ति को धोखाधड़ी से हड़पना जैसे गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है. आरोप साबित होने पर इस मामले में आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है. सीबीआई के मुताबिक, यह धोखाधड़ी 28 बैंकों के समूह के साथ किया गया. इन बैंकों में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, आईसीआईसीआई, आईडीबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक आदि शामिल हैं.

एबीजी शिपयार्ड पर एसबीआई का 2,925 करोड़ रुपये, आईसीआईसीआई बैंक का 7,089 करोड़ रुपये, आईडीबीआई बैंक का 3,634 करोड़ रुपये, बैंक ऑफ बड़ौदा का 1,614 करोड़ रुपये, पीएनबी का 1,244 करोड़ रुपये और इंडियन ओवरसीज बैंक का 1,228 करोड़ रुपये बकाया है।

प्राथमिकी में यह भी उल्लेख किया गया है, “वस्तुओं की मांग और कीमतों में गिरावट और बाद में कार्गो मांग में गिरावट के कारण वैश्विक संकट ने शिपिंग उद्योग को प्रभावित किया है। कुछ जहाजों/जहाजों के अनुबंधों को रद्द करने के परिणामस्वरूप इन्वेंट्री का ढेर लग गया। इसके परिणामस्वरूप कार्यशील पूंजी की कमी हुई है और परिचालन चक्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे चलनिधि की समस्या और वित्तीय समस्या बढ़ गई है। वाणिज्यिक जहाजों की कोई मांग नहीं थी क्योंकि उद्योग 2015 में भी मंदी के दौर से गुजर रहा था। इसके अलावा, 2015 में कोई नया रक्षा आदेश जारी नहीं किया गया था। कंपनी को सीडीआर में परिकल्पित मील के पत्थर हासिल करना बहुत मुश्किल लग रहा था। इस प्रकार, कंपनी नियत तारीख पर ब्याज और किश्तों का भुगतान करने में असमर्थ थी।

एबीजीएसएल ने पिछले 16 वर्षों में 165 से अधिक जहाजों (निर्यात बाजार के लिए 46 सहित) का निर्माण किया है, जिसमें न्यूजप्रिंट कैरियर्स, सेल्फ-डिस्चार्जिंग और लोडिंग बल्क सीमेंट कैरियर, फ्लोटिंग क्रेन, इंटरसेप्टर बोट, डायनेमिक पोजिशनिंग डाइविंग सपोर्ट वेसल, पुशर टग और फ्लोटिला जैसे विशेष जहाज शामिल हैं। एबीजीएसएल ने कथित तौर पर 2011 में भारतीय नौसेना से निर्मित जहाजों के लिए अनुबंध प्राप्त किया था, हालांकि, अनुबंध को बाद में समाप्त कर दिया गया था क्योंकि फर्म आर्थिक रूप से संघर्ष कर रही थी।

236 करोड़ रुपये भेजे सिंगापुर

आरोप के मुताबिक, इस कंपनी ने बैंकों के समूह से लोन के अलावा कई प्रकार की क्रेडिट सुविधाएं भी ली हुई थीं. बैंकों से मिले पैसों को इस कंपनी ने अपनी सहयोगी कंपनियों के जरिए विदेशों में भी भेजा और वहां पर शेयर आदि खरीदे. इस मामले में 236 करोड़ रुपये सिंगापुर भेजे जाने का भी पता चला है. यह भी पता चला है कि बैंकों से जिस काम के लिए लोन या क्रेडिट गारंटी ली गई थी, उस काम में पैसे का इस्तेमाल ना कर उन पैसों से कई प्रॉपर्टीज खरीदी गईं. साथ ही तमाम नियम कानूनों को ताक पर रखकर पैसा एक कंपनी से दूसरी कंपनियों में भेजा गया.

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